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शपथ ग्रहण का विरोध से लेकर NEET पेपर लीक तक, धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल से जुड़े 10 विवाद

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेज दिया। यह फैसला ऐसे समय आया जब पिछले एक महीने से देशभर में नीट-यूजी 2026 पेपर लीक को लेकर छात्र आंदोलन जारी था। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में कई राज्यों तक फैल गया। कॉकरोच जनता पार्टी और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन से चल रहे इस आंदोलन की सबसे बड़ी मांग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी। अपने इस्तीफे की जानकारी एक्स पर साझा करते हुए प्रधान ने कहा कि वह छात्रों के भविष्य की रक्षा, जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का राष्ट्रविरोधी ताकतों की ओर से दुरुपयोग रोकने और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए यह कदम उठा रहे हैं।

करीब साढ़े चार साल तक शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाले धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल नई शिक्षा नीति (NEP) लागू करने से लेकर कई परीक्षा विवादों और राज्यों के साथ टकराव तक लगातार चर्चा में रहा। आइए जानते हैं उनके कार्यकाल के 10 बड़े विवाद।

1. शपथ ग्रहण के दौरान विरोध

जून 2024 में 18वीं लोकसभा के गठन के बाद जब धर्मेंद्र प्रधान ने सांसद और मंत्री पद की शपथ ली, तब विपक्षी इंडिया गठबंधन के सांसदों ने नीट और शेम-शेम के नारे लगाकर उनका विरोध किया। उस समय नीट-यूजी 2024 में पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा था।

2. दो बार नीट-यूजी पेपर लीक विवाद

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल का सबसे बड़ा विवाद NEET परीक्षा से जुड़ा रहा। 2024 में पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सीबीआई जांच शुरू हुई। इसके बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के प्रमुख को भी पद छोड़ना पड़ा। 2026 में यह संकट फिर सामने आया। 3 मई को हुई नीट-यूजी परीक्षा को 12 मई को रद्द कर दिया गया, क्योंकि राजस्थान के कुछ कोचिंग संस्थानों से जुड़े गेस पेपर के जरिए प्रश्नपत्र लीक होने की बात सामने आई। इसके बाद 21 जून को कड़ी सुरक्षा के बीच दोबारा परीक्षा कराई गई। इसी मुद्दे को लेकर सीजेपी ने जंतर-मंतर पर लंबा धरना दिया।

3. यूजीसी-नेट परीक्षा रद्द

जून 2024 में यूजीसी-नेट परीक्षा आयोजित होने के सिर्फ एक दिन बाद ही उसे रद्द करना पड़ा। खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी में पता चला कि प्रश्नपत्र टेलीग्राम और डार्क वेब के जरिए लीक हो गया था। धर्मेंद्र प्रधान ने CBI जांच के आदेश दिए, लेकिन इस घटना ने एनटीए की विश्वसनीयता पर और सवाल खड़े कर दिए।

4. एनटीए पर लगातार उठते सवाल

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में NTA की कार्यप्रणाली लगातार विवादों में रही। तकनीकी गड़बड़ियां, मूल्यांकन संबंधी शिकायतें, डेटा सुरक्षा और आउटसोर्सिंग जैसी समस्याओं को लेकर एजेंसी की आलोचना होती रही। सुधार के लिए कई समितियां बनाई गईं, जिनमें इसरो के पूर्व अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की समिति भी शामिल थी, लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए।

5. सीबीएसई ऑन-स्क्रीन मार्किंग विवाद

2026 में सीबीएसई ने 12वीं बोर्ड परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम लागू किया। इसके बाद स्कैनिंग में खराब गुणवत्ता, तकनीकी दिक्कतों और मूल्यांकन में गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आईं। छात्रों और शिक्षकों ने विरोध किया। कई अधिकारियों का तबादला हुआ और बाद में जांच समिति भी बनाई गई।

6. पीएम श्री स्कूल योजना पर राज्यों का विरोध

प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएम श्री) योजना को लेकर कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने आपत्ति जताई। तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और पंजाब ने शुरुआत में केंद्र के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उनका आरोप था कि नई शिक्षा नीति को स्वीकार करने के लिए केंद्र वित्तीय सहायता का दबाव बना रहा है। बाद में कुछ राज्यों ने समझौता किया, लेकिन तमिलनाडु और केरल लंबे समय तक अपने रुख पर कायम रहे।

7. तीन-भाषा नीति और हिंदी थोपने का आरोप

नई शिक्षा नीति की तीन-भाषा व्यवस्था को लेकर विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़ा विवाद हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र पर हिंदी थोपने की कोशिश का आरोप लगाया। धर्मेंद्र प्रधान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह नीति भाषाई विविधता और मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए है। इस मुद्दे पर केंद्र और राज्यों के बीच कई बार टकराव देखने को मिला।

8. एनसीईआरटी की किताबों में बदलाव

2022-23 में एनसीईआरटी ने किताबों के रैशनलाइजेशन के तहत मुगल इतिहास, 2002 गुजरात दंगे, शीत युद्ध और लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े कई हिस्से हटाए। सरकार ने इसे छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने की कवायद बताया, जबकि विपक्ष और कई शिक्षाविदों ने इसे इतिहास के राजनीतिक लेखन का प्रयास बताया।

9. कुलपतियों की नियुक्ति के नए नियम

जनवरी 2025 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने कुलपति नियुक्ति से जुड़े नए मसौदा नियम जारी किए। इनमें गैर-शैक्षणिक और उद्योग जगत के लोगों को भी कुलपति बनने की पात्रता देने का प्रस्ताव था। कई राज्यों और शिक्षाविदों ने इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे में हस्तक्षेप बताते हुए विरोध किया।

10. उच्च शिक्षा में समानता संबंधी नियम

2026 में यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए समानता संबंधी नियम लागू करने की घोषणा की। इन नियमों को लेकर दुरुपयोग, सामाजिक विभाजन और भेदभाव के नए विवाद खड़े होने की आशंका जताई गई। कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में इन नियमों के अमल पर रोक लगा दी और पुराने नियम लागू रखने के निर्देश दिए।

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