Prakash veg

Latest news uttar pradesh

पेट्रोल-डीजल सेफ, तो फिर LPG गैस कैसे हो गई ‘आउट ऑफ स्टॉक’? पूरी इनसाइड स्टोरी

1 min read

जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, दुनिया भर की धड़कनें तेज हो जाती हैं। ओमान और ईरान के बीच स्थित ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट्स’ में से एक है। जब इस मार्ग पर किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो आम धारणा यह होती है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। लेकिन हालिया संकटों और डेटा का गहराई से विश्लेषण करने पर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है: होर्मुज संकट का सबसे बड़ा और सबसे तेज शिकार पेट्रोल या डीजल नहीं, बल्कि हमारी रसोई में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी (LPG) गैस हुई है। दिल्ली, नोएडा, मुंबई, बेंगलुरु और छोटे शहरों में लंबी कतारें लगी हैं। एलपीजी सिलिंडर एजेंसियों के बाहर महिलाएं और पुरुष घंटों इंतजार कर रहे हैं। रेस्टोरेंट और ढाबे बंद हो रहे हैं- कुछ मेन्यू में कटौती कर रहे हैं, कुछ पूरी तरह शटर डाउन कर रहे हैं। कमर्शियल सिलिंडर तो ब्लैक मार्केट में 5000 रुपये तक पहुंच गए हैं। लेकिन पेट्रोल पंपों पर न कोई भीड़, न कीमतों में उछाल। डीजल के ट्रक चल रहे हैं, कारें भर रही हैं। सवाल एक ही है- हॉर्मुज स्ट्रेट ब्लॉक होने का असर क्यों सिर्फ एलपीजी पर पड़ा, पेट्रोल-डीजल पर नहीं?

यह कोई संयोग नहीं। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा की पूरी तस्वीर है- जहां क्रूड ऑयल के लिए हमने पिछले 10 साल में बफर बनाए, लेकिन एलपीजी और गैस के लिए लगभग बिना सुरक्षा के खड़े हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह 21 मील चौड़ा जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण एनर्जी चोकपॉइंट है। यहां से रोजाना लगभग 20% ग्लोबल ऑयल और गैस गुजरता है। सऊदी अरब, कतर, यूएई, कुवैत, इराक सभी बड़े निर्यातक इसी रास्ते पर निर्भर। यानी ये देश अपने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का निर्यात इसी संकरे मार्ग से करते हैं। अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद ईरान ने बदला लिया- स्ट्रेट को ब्लॉक कर दिया। कोई भी गैर-ईरानी जहाज पर हमले का खतरा है। नतीजा: एलपीजी और एलएनजी टैंकर फंस गए। भारत जैसे देश गल्फ से आयात करते हैं, वे सबसे पहले प्रभावित हुए। लेकिन पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं?

पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत हर साल 3.1 करोड़ टन से अधिक एलपीजी की खपत करता है। हमारा घरेलू उत्पादन इस मांग के आधे हिस्से को भी पूरा नहीं कर पाता है। बाकी की जरूरतें खाड़ी देशों- जैसे सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत से आयात करके पूरी की जाती हैं। एलपीजी ले जाने वाले टैंकरों को भारत पहुंचने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरना पड़ता है। अनुमानों के अनुसार, भारत आने वाले एलपीजी कार्गो का लगभग 80-90% हिस्सा इसी मार्ग से आता है। यही कारण है कि जब इस मार्ग पर रुकावट आई, तो भारत की रसोई ने इसका झटका सबसे पहले महसूस किया।

एलपीजी के लिए कोई सामरिक भंडार (SPR) नहीं है। यह सबसे अहम कारण है। कच्चे तेल को विशाल भूमिगत गुफाओं या सामान्य टैंकों में आसानी से और सस्ते में जमा किया जा सकता है। लेकिन एलपीजी को तरल अवस्था में बनाए रखने के लिए अत्यधिक दबाव या क्रायोजेनिक (अति-न्यून तापमान) टैंकों की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और तकनीकी रूप से जटिल है। इसलिए, दुनिया में किसी भी देश के पास एलपीजी का कोई बड़ा राष्ट्रीय आपातकालीन भंडार नहीं है। आपूर्ति रुकने का सीधा असर कुछ ही दिनों में घरेलू उपभोक्ताओं पर दिखने लगता है।

कच्चे तेल (जिससे पेट्रोल और डीजल बनते हैं) के मामले में दुनिया ने पिछले कुछ दशकों में खुद को कई तरह के झटका सहने वाले तंत्र से लैस कर लिया है। भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात करता है। हाल के वर्षों में रूस सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जिसके बाद इराक और सऊदी अरब का नंबर आता है। रूसी कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा उन मार्गों से भारत पहुंचता है जो होर्मुज से नहीं गुजरते। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, भारत का 70% कच्चा तेल आयात अब होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर के स्रोतों से आता है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने हाल ही में अमेरिका द्वारा दी गई 30 दिन की छूट के बाद 30 मिलियन बैरल रूसी क्रूड खरीदा है। भारत के पास घरेलू मांग की तुलना में अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता भी है, जो आपूर्ति में बदलाव होने पर लचीलापन प्रदान करती है। इसके अलावा, अमेरिका, भारत, चीन और कई यूरोपीय देशों के पास कच्चे तेल का विशाल आपातकालीन भंडार होता है। होर्मुज में रुकावट आने पर, ये देश महीनों तक अपने भंडार से काम चला सकते हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति तुरंत बाधित नहीं होती। यह एक सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि पेट्रोल-डीजल की किल्लत तुरंत महसूस नहीं हुई।

भारत कच्चे तेल के लिए ‘रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार’ रखता है। विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में भूमिगत रॉक गुफाओं में आपातकालीन स्थितियों के लिए तेल जमा किया जाता है। रिफाइनरियों और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के वाणिज्यिक भंडार को मिला दें, तो भारत के पास कई हफ्तों की खपत के लिए पर्याप्त कच्चा तेल है।

कच्चे तेल के विपरीत, भारत के पास एलपीजी का बड़ा रणनीतिक भंडार नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, मंगलुरु और विशाखापत्तनम में भारत के एलपीजी गुफाओं की कुल क्षमता मात्र 1.4 लाख टन है, जो दो दिन की खपत के बराबर भी नहीं है। भारत का गैस सिस्टम भंडारण के बजाय निरंतर प्रवाह के लिए डिजाइन किया गया है। IEA की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 4 bcm (अरब घन मीटर) क्षमता वाले अंडरग्राउंड गैस स्टोरेज का प्रस्ताव अभी व्यवहार्यता के चरण में है, जिसे बनने में 3-4 साल लगेंगे और इस पर 1-2 अरब डॉलर का खर्च आएगा।

पिछले एक दशक में एलपीजी सिलेंडरों की मांग में भारी उछाल आया है। केंद्र की ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ ने लाखों ग्रामीण परिवारों तक रसोई गैस की पहुंच बढ़ाई है। पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण सेल के आंकड़ों के अनुसार, एलपीजी कनेक्शन की संख्या 2010 में 10.6 करोड़ थी, जो 2014 में 14.5 करोड़, 2018 में 22.4 करोड़ और 2025 तक बढ़कर लगभग 33 करोड़ हो गई है। लकड़ी और बायोमास से एलपीजी की ओर यह बदलाव एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य सफलता है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि भारतीय रसोई अब एलपीजी के निरंतर प्रवाह पर बहुत अधिक निर्भर है।

केंद्र और गैस कंपनियों ने एलपीजी की उपलब्धता को स्थिर करने के लिए आपातकालीन उपाय शुरू कर दिए हैं। रिफाइनरियों को क्रूड प्रोसेसिंग से एलपीजी की रिकवरी को अधिकतम करने के लिए कहा गया है। अधिक रसोई गैस का उत्पादन करने के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी पेट्रोकेमिकल सामग्रियों को अस्थायी रूप से डायवर्ट किया जा रहा है। सरकार खाड़ी के बाहर (जैसे अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका) के आपूर्तिकर्ताओं से अतिरिक्त कार्गो की तलाश कर रही है। हालांकि, इन शिपमेंट को आने में अधिक समय लग सकता है और इनकी कीमत भी अधिक हो सकती है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published.

https://slotbet.online/