आगरा में बोलीं राज्यपाल, युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते जंतर-मंतर वाले
1 min read
भारत का भविष्य केवल हवा-हवाई बातों से नहीं, बल्कि हमारे युवाओं की प्रतिभा, परिश्रम और संकल्प से बनेगा। आज का भारत अवसरों का भारत है, नवाचार का भारत है और युवा शक्ति के सामर्थ्य का भारत है। हमारे युवाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब संकल्प ऊंचा हो, तो आकाश भी सीमा नहीं रहता। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल लोग केवल एक-दो प्रतिशत ही युवा थे। उन्हें छोड़िए, उनके बारे में सोचिए ही मत, बल्कि वहां मौजूद युवाओं के संस्कारों के बारे में सोचिए। यह बातें राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को आगरा में कहीं। वह डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के 92वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं।
विश्वविद्यालय के खंदारी परिसर स्थित छत्रपति शिवाजी मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में कुलाधिपति ने कहा कि युवाओं की इन उपलब्धियों में केवल पदकों की चमक नहीं है, बल्कि अनगिनत घंटों की साधना, अनुशासन, जिज्ञासा और आत्मविश्वास का तेज समाहित है। ये सफलताएं हमें यह संदेश देती हैं कि भारतीय युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं, बल्कि वर्तमान के परिवर्तनकारी नेतृत्वकर्ता हैं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि समाज की स्थानीय समस्याओं का स्थायी समाधान खोजना होना चाहिए। जब स्थानीय प्रतिभा, ज्ञान और संसाधन एक साथ मिलते हैं, तब नवाचार का जन्म होता है।
किताबी ज्ञान नहीं, कौशल में हों पारंगत
राज्यपाल ने युवाओं को पर्यावरण संरक्षण और वेस्ट टू वेल्थ की अवधारणा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का त्याग करने, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन देने, स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देने और वोकल फॉर लोकल के लिए आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सत्यनिष्ठा, कठोर परिश्रम, अनुशासन और समाज सेवा को जीवन का आधार बनाकर ही युवा अपने परिवार, विश्वविद्यालय और राष्ट्र को गौरवान्वित कर सकते हैं। उन्होंने युवाओं को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर कला, रचनात्मकता और व्यावहारिक कौशलों में पारंगत होने की सलाह दी, ताकि वे जीवन की हर चुनौती का हिम्मत से सामना कर सकें।
सवाल पूछने वाले हैं समाज के कौवे
राज्यपाल ने कहा, आप अच्छा कार्य कर रहे होते हैं, लेकिन कोई कुछ पूछ लेता है और आप डरने लगते हैं। मैं कहती हूं-डरो मत! क्योंकि समाज में ऐसे कौवे बैठे हैं। ये समाज के कौवे हैं, जिन्हें कुछ अच्छा लगता ही नहीं है और न कभी लगेगा। ऐसे लोग संस्थान के अंदर भी बैठे हैं और बाहर भी। जो अंदर बैठे हैं, उन्हें क्या आपत्ति है? ऐसे लोगों से डरिए मत, बस अच्छा काम करते रहिए।
