हिंसा रोकने की शर्त या असहमति पर अंकुश, लोकतंत्र की असली कसौटी | संपादकीय
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इसमें कोई दोराय नहीं कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसक गतिविधियों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। इसलिए अगर सरकार हिंसा की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से कोई पहल कर रही है, तो इसका आशय समझा जाना चाहिए। मगर इसके समांतर यह प्रश्न भी अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है कि हिंसा को न पनपने देने के सरकार के कदम अप्रत्यक्ष रूप से लोकतांत्रिक स्वरों को बाधित तो नहीं करेंगे!
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अलग-अलग विभागों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती से चुने जाने वाले अभ्यर्थियों के चरित्र प्रमाणपत्र से जुड़े नियमों में एक अहम बदलाव किया है। इसके तहत यह कहा गया है कि राज्य में व्यवस्था परिवर्तन के उद्देश्य से अगर कोई युवा सड़क पर उतरकर हिंसा करता है, तो उसे सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी।
नए नियमों के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति ऐसे संगठन का सदस्य है, जिसका मकसद हिंसा के जरिए समाज की व्यवस्था बदलना है, तो उसे भी अयोग्य माना जाएगा। हालांकि, यह भी कहा गया है कि किसी व्यक्ति को सिर्फ उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर अपात्र घोषित नहीं किया जाएगा।
पिछले कुछ समय से दुनिया के कई देशों में सरकार के खिलाफ आम लोगों के प्रदर्शनों का जैसा स्वरूप देखा गया, उसमें जैसी हिंसा और अराजकता देखी गई, उसे विरोध का लोकतांत्रिक तरीका नहीं कहा जा सकता। ऐसे प्रदर्शनों से निपटना एक बड़ी चुनौती हो जाती है। मगर यह जरूरी नहीं है कि भारत में भी सरकार से असहमति जाहिर करने के लिए यहां के युवा वही तरीका अपनाएं। आमतौर पर हमारा देश लोकतांत्रिक परंपराओं में विश्वास रखता है और इसी के अनुरूप सरकार के समर्थन या विरोध में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राय अभिव्यक्त करता है।
ऐसे में हिंसा के विरुद्ध किसी राज्य सरकार की ओर से अलग से नए नियमों की घोषणा की जरूरत का संदर्भ समझना मुश्किल है। हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि हिंसा में स्पष्ट भागीदारी की अंतिम पुष्टि होने तक किसी को नौकरी के अवसर से वंचित नहीं किया जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि इस मामले में सरकार के नए नियमों की व्याख्या कौन करेगा। आम जनता के आंदोलन में ‘हिंसा’ की परिभाषा किस आधार पर तय की जाएगी और यह कैसे सुनिश्चित होगा कि विरोध के किसी स्वरूप को सरकार ‘हिंसक’ घोषित नहीं करेगी?
यों यह कोई पहला मामला नहीं है कि हिंसा के आधार पर नौकरी से वंचित करने का नियम लागू करने की कोशिश की जा रही है। वर्ष 2021 में बिहार में भी एक आदेश में कहा गया था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान हंगामा हुआ और उससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हुई, तो प्रदर्शन में शामिल लोगों को सरकारी नौकरी से वंचित होना पड़ेगा।
तब इस संदर्भ में चरित्र प्रमाणपत्र निर्गत करने का भी निर्देश जारी हुआ था। सवाल है कि उत्तर प्रदेश में जारी नए नियमों का उद्देश्य वास्तव में विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने वाले आम लोगों या युवाओं को हिंसा से दूर रखना है या फिर इसके जरिए एक डर पैदा किया जाएगा, ताकि सरकार के खिलाफ असहमति के स्वर उभरने से पहले ही दब जाएं?
जिस दौर में बेरोजगारी पहले ही देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है, उसमें ऐसी शर्तों का वास्तविक असर क्या होगा? लोकतंत्र में हिंसा की जगह नहीं हो सकती। मगर इसके लिए युवाओं को ‘सरकारी नौकरी से वंचित रखने’ का नियम बनाना पड़े, तो क्या उसे अभिव्यक्ति पर अंकुश की तरह नहीं देखा जाएगा और क्या यह लोकतंत्र के जीवन को प्रभावित नहीं करेगा?
