CWG 2026: गुलवीर ने राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीत बढ़ाया यूपी का मान, मां को मेडल संग बेटे का इंतजार
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राष्ट्रमंडल खेलों में एथलीट गुलवीर सिंह के रजत पदक जीतने पर यूपी के अलीगढ़ स्थित उनके गांव सिरसा से लेकर पूरे जिले में जश्न का माहौल है। गुलवीर की इस उपलब्धि पर गांव वालों ने गुलाल लगाकर और उड़ाकर एक-दूसरे को बधाई दी। गुलवीर के पिता पप्पू सिंह बेटे की ऐतिहासिक उपलब्धि पर भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि वर्षों की मेहनत आज रंग लाई है। गांव वालों ने इसे पूरे अलीगढ़ और देश के लिए गर्व का क्षण बताया। ग्लासगो के एथलेटिक्स ट्रैक पर इतिहास रचने वाले गुलवीर सिंह की इस सफलता की नींव किसी आधुनिक स्पोर्ट्स एकेडमी में नहीं, बल्कि अलीगढ़ जिले के अतरौली क्षेत्र के पास स्थित एक छोटे से गांव ‘सिरसा’ के खेतों की धूल में रखी गई थी।
1 जून 1998 को एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गुलवीर को बचपन में न तो राष्ट्रमंडल खेलों की जानकारी थी और न ही एशियाई खेलों की। गांव के अन्य युवाओं की तरह उनका भी एकमात्र लक्ष्य सिर्फ भारतीय सेना में भर्ती होना था। दौड़ना उनके लिए कोई मेडल जीतने का जरिया नहीं, बल्कि सेना की शारीरिक परीक्षा पास करने की मजबूरी और तैयारी थी। इस ऐतिहासिक सफलता के साथ ही गुलवीर ने सात समंदर पार स्कॉटलैंड की धरती पर भारत सहित अपने गृह जनपद अलीगढ़ का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है।
मां को है मेडल के साथ बेटे का इंतजार
एशियन गेम्स में मेडल जीतकर जब गुलवीर से गांव लौटे थे तब पूरे गांव ने उनका जोर शोर से स्वागत किया था। गांव पहुंचते ही मां के पांव छूकर गले लगा लिया था। इस बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले गुलवीर की मां की आंखों में एक ओर जहां खुशी के आंसू नजर आए। वहीं मेडल के साथ साथ वह बेटे का इंतजार भी कर रही हैं। बुधवार को हिन्दुतान टीम ने उनके परिजनों और ग्रामीणों से बात की। रजत जीतने के बाद मां लक्ष्मी आंखों में आंसू लिए बोलीं कि अब बेटा आ जाए, एक और मेडल घर में सजाऊंगी। दूसरी ओर, गांव के हर घर में गुलवीर के ही चर्चे हो रहे थे। गांव का प्राचीन उड़िया बाबा का मंदिर चौपाल में बदला नजर आया। हर कोई गुलवीर की उपलब्धि और उनके सौम्य व्यवहार की चर्चा कर रहा था।
खेतों में बहाया पसीना जूते तक का था अभाव
एक गरीब किसान के बेटे होने के कारण शुरुआती दिनों में उनके पास पेशेवर रनिंग शूज (स्पाइक्स) और ट्रैक की सुविधाएं नहीं थीं। वह गांव की कच्ची पगडंडियों और पिता के खेतों के किनारे ही घंटों पसीना बहाते थे। वर्तमान में भारतीय सेना में नायब सूबेदार के पद पर कार्यरत गुलवीर, भारत के सर्वश्रेष्ठ लॉन्ग-डिस्टेंस रनर बन चुके हैं।
सेना में भर्ती और किस्मत का मोड़
साल 2018 में उनकी मेहनत रंग लाई और वे भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में बतौर सिपाही भर्ती हो गए। सेना में आने के बाद जब उन्होंने सैन्य इकाइयों के बीच होने वाली क्रॉस-कंट्री रेस में हिस्सा लिया, तब उनके भीतर छिपे असाधारण धावक की पहचान हुई और अफसरों ने उन्हें पेशेवर ट्रेनिंग के लिए प्रेरित किया। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनके अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स करियर की मजबूत नींव बना और उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए ऐतिहासिक रजत पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। आज उनकी उपलब्धि पर पूरा देश जश्न मना रहा है।
अब ओलंपिक की बारी : पप्पू सिंह
बेटे ने एशियन, राष्ट्रमंडल खेल समेत अनेक चैंपियनशिप में मेडल जीतकर रिकॉर्ड बनाया है। बेटे का एक ही सपना है ओलंपिक में मेडल जीतना। इस बार तो रह गया था अब ओलंपिक मेडल भी अलीगढ़ में आएगा। यह बातें उनके पिता पप्पू सिंह ने खुशी का इंजहार करते हुए कहीं। एशियन गेम्स में पदक जीतकर लौटने के बाद गुलवीर सिंह ने अपनी सफलता और पहले अंतरराष्ट्रीय पदक का अनुभव हिन्दुस्तान समाचार पत्र के साथ साझा करते हुए कहा था कि एशियन जीत लिया अब ओलंपिक की बारी है। पर 2024 पेरिस ओलंपिक का वे हिस्सा नहीं बन सके। उनके इस सपने को पिता अपने दिल में संजोए हुए हैं। बुधवार को हिन्दुस्तान टीम से पिता पप्पू सिंह ने कहा कि बेटे ने एशियन पदक जीतते ही ओलंपिक मेडल जीतने का लक्ष्य बना लिया था। एशियन और राष्ट्रमंडल खेल में मेडल तो आ गया। अब ओलंपिक की बारी है। इस बार मेरा बेटा चूकने वाला नहीं है। नेशनल से लेकर इंटरनेशनल सभी रिकॉर्ड गुलवीर ने हासिल किए हैं।
मंदिर के महंत खरेशानंद ने बताया कि गुलवीर ने जब एशियन गेम्स में मेडल जीता था। तब पुरस्कार में मिली 20 लाख रुपये की राशि मंदिर को दान कर दी थी। इस बार बाबा की कृपा और उनकी मेहनत ने देश को रजत पदक दिया है। बाबा की कृपा उन पर हमेशा ही बनी रहेगी। अब तो पूरे गांव को गुलवीर के लौटने का इंतजार है।
बदल दी युवाओं की सोच
गुलवीर सिंह की सफलता ने यह साबित कर दिया कि विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनने के लिए केवल आधुनिक सुविधाएं ही जरूरी नहीं, बल्कि अटूट मेहनत, अनुशासन और दृढ़ संकल्प सबसे बड़ी ताकत हैं। खेतों की पगडंडियों से निकलकर राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतने वाले गुलवीर आज अलीगढ़ के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
