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ससुर के निधन के बाद भी विधवा बहू को ‘पूरा अधिकार’, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दी पूरी बात

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नई दिल्ली. पति के निधन के बाद बेसहारा हुई महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ कानूनी ही नहीं, बल्कि सामाजिक तौर पर भी बहुत अहम माना जा रहा है. विधवा महिला को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है और उसे सिर्फ तकनीकी वजहों से नहीं छीना जा सकता, ऐसा साफ कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण कानून, 1956 के तहत विधवा बहू को ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण पाने का पूरा अधिकार है, यह कोर्ट ने साफ किया है.
जज पंकज मित्तल और जज एम. वी. एन. भट की बेंच ने यह फैसला दिया. कोर्ट ने कहा कि कानून के सेक्शन 21 में इस्तेमाल किया गया ‘बेटे की विधवा’ शब्द बहुत व्यापक अर्थ में देखा जाना चाहिए. पति की मौत सास-ससुर के पहले हुई या बाद में, इस तकनीकी बात पर बहू का भरण-पोषण का अधिकार नहीं छीना जा सकता. सिर्फ पति की मौत के समय के आधार पर महिलाओं में भेदभाव करना तर्कहीन है और भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन है, ऐसा कोर्ट ने साफ किया.
इस मामले की पृष्ठभूमि देखें तो, दिवंगत डॉ. महेंद्र प्रसाद के परिवार में विवाद से यह मामला शुरू हुआ था. डॉ. प्रसाद का निधन 2021 में हुआ, और उसके बाद 2023 में उनके बेटे की मौत हो गई. बेटे की मौत के बाद उसकी पत्नी गीता शर्मा ने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग की. लेकिन शुरुआत में फैमिली कोर्ट ने यह मांग खारिज कर दी. वजह यह दी गई कि ससुर की मौत के वक्त गीता शर्मा विधवा नहीं थीं. इसके बाद मामला हाई कोर्ट गया.
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर विधवा बहू के पक्ष में फैसला दिया. इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए इस मामले पर अंतिम मुहर लगा दी है.

कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि सास-ससुर के निधन के बाद पति की मौत हुई हो, फिर भी विधवा बहू को ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण मांगने का अधिकार है. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण कानून में ‘बेटे की विधवा’ की परिभाषा में सभी विधवा बहुएं शामिल हैं. पति की मौत के समय के आधार पर विधवाओं में फर्क करना असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है.
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर कोई विधवा महिला खुद का गुजारा करने में असमर्थ है, तो उसे यह कानूनी हक मिलना ही चाहिए. इस फैसले में कोर्ट ने मनुस्मृति का भी हवाला दिया. परिवार की महिलाओं की सुरक्षा करना परिवार के मुखिया का कर्तव्य है, ऐसा कहते हुए कोर्ट ने कहा कि तकनीकी वजहों से भरण-पोषण न देने पर विधवा महिला को भूख और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है, ऐसा कोर्ट ने नोट किया.
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