अमौसी जोन में बिजली कनेक्शन ट्रांसफर में बड़ा फर्जीवाड़ा, आधार की आड़ में 37 मिनट में नाम बदलने का खेल
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एसडीओ आईटी की कार्यप्रणाली कठघरे में, टीजी-2 की जांच को किया जा रहा बाईपास, जिम्मेदार अभियंताओं की स्वीकृति के बिना ही हो रहा ट्रांसफर
लखनऊ। राजधानी के अमौसी जोन में कनेक्शन ट्रांसफर के नाम पर जो खेल चल रहा है, उसने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा कर दिया है। बिजली चोरी रोकने और राजस्व बढ़ाने की बजाय यहां कनेक्शन के नाम परिवर्तन को ही कमाई का जरिया बना लिया गया है। आरोप बेहद गंभीर हैं – आधार कार्ड दिखाओ और बिना किसी वैध दस्तावेज, बिना टीजी-2 की मौके की जांच और बिना सक्षम अभियंता की स्वीकृति के अपना कनेक्शन किसी दूसरे के नाम करा लो। सूत्रों से मिली जानकारी में चौंकाने वाली बात सामने आई कि मात्र 37 मिनट में किसी भी कर्मचारी के लिए मौके पर जाकर लोड का सत्यापन, मीटर की स्थिति, बकाया की जांच और प्रॉपर्टी के कागज देखना असंभव है। इससे साफ जाहिर होता है कि यह काम सिर्फ सिस्टम पर बैठकर, बिना फील्ड वेरिफिकेशन के किया गया है।
दूसरा पहलू :नियम क्या कहता है और उल्लंघन कैसे हो रहा है?
उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के विद्युत आपूर्ति संहिता के अनुसार नाम परिवर्तन (Tatkal / सामान्य) के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य है –
अनिवार्य दस्तावेज: मकान की रजिस्टर्ड रजिस्ट्री / दाखिल-खारिज / उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, पुराने और नए उपभोक्ता का शपथ पत्र, बकाया न होने का प्रमाण।
अनिवार्य जांच: संबंधित फीडर के अवर अभियंता (JE) द्वारा पत्रावली का परीक्षण और टीजी-2 कर्मचारी द्वारा मौके की जांच रिपोर्ट, जिसमें लोड, मीटर नंबर, परिसर की फोटो और रिपोर्ट लगती है।
अनिवार्य स्वीकृति: अंतिम स्वीकृति उपखंड अधिकारी और कई मामलों में अधिशासी अभियंता स्तर से होती है।
अमौसी में आरोप है कि इन तीनों चरणों को बाईपास किया जा रहा है। सिर्फ आधार को ही स्वामित्व का प्रमाण मान लिया गया है, जबकि आधार पहचान का प्रमाण है, संपत्ति के स्वामित्व का नहीं। इस तरह कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के मकान पर चल रहे कनेक्शन को अपने आधार से अपने नाम करा सकता है, जो भविष्य में संपत्ति विवाद का कारण बनेगा।
3. तीसरा पहलू: आईटी विंग का इस काम से क्या लेना-देना? एसडीओ आईटी की भूमिका संदिग्ध
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू है। विभाग में आईटी विंग का काम सॉफ्टवेयर, बिलिंग, सर्वर और डेटा मेंटेनेंस देखना है, न कि कनेक्शन का वाणिज्यिक निर्णय लेना।
सूत्रों का कहना है कि अमौसी जोन में डेटा करेक्शन के नाम पर आईटी के कर्मचारी ही CC&B में सीधे नाम बदल रहे हैं। नियमानुसार आईटी केवल SDO/JE द्वारा अनुमोदित पत्रावली पर ही सिस्टम में एंट्री कर सकता है, वह स्वयं स्वीकर्ता नहीं हो सकता।
तो सवाल उठता है –
• क्या एसडीओ आईटी के संरक्षण में यह व्यवस्था चल रही है?
• क्या उनकी लॉगिन आईडी से या उनके अधीनस्थों की आईडी से वाणिज्यिक अधिकारों का दुरुपयोग हो रहा है?
• अगर ऐसा हो रहा है तो जोन के जिम्मेदार अधिशासी अभियंता और अधीक्षण अभियंता इस पर मौन क्यों हैं?
चौथा पहलू: सूत्रों के अनुसार अवैध वसूली और राजस्व को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने का कार्य भी जोर शोर से जारी है
बिना कागज के ट्रांसफर के लिए प्रति कनेक्शन 3000 से 8000 रुपये तक की अवैध वसूली की जा रही है। क्योंकि इसमें कोई रसीद नहीं कटती, इसलिए यह पैसा सीधे जेब में जाता है।
इससे निगम को दोहरा नुकसान है। पहला – गलत व्यक्ति के नाम कनेक्शन होने से बकाया वसूली में दिक्कत आएगी। दूसरा – प्रॉपर्टी के असली मालिक के वापस आने पर विवाद होगा और निगम को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे।
5. पांचवां पहलू: उपभोक्ता पर क्या बीतेगी?
अगर आपका कनेक्शन किसी दूसरे ने सिर्फ आधार के आधार पर अपने नाम करा लिया, तो कल को आप अपना कनेक्शन कैसे साबित करेंगे? मकान बेचने, लोन लेने या नया लोड बढ़वाने में आपको ही दिक्कत होगी। आधार से नाम बदलना आपके संपत्ति अधिकार पर सीधा हमला है।
अब आगे क्या? निष्पक्ष जांच की मांग तेज
इस खबर के बाद मांग उठ रही है कि –
1. मध्यांचल के प्रबंध निदेशक इस मामले का संज्ञान लेकर अमौसी जोन में पिछले एक साल में हुए सभी Data Correction Complete केसों का ऑडिट कराएं।
2. हर केस में टीजी-2 की फील्ड जांच की फोटो, जीपीएस लोकेशन और जे-ई की रिपोर्ट तलब की जाए।
3. आईडी से हुए सभी ट्रांसफर की सूची और उनमें लगी आईपी एड्रेस की जांच हो।
4. एसडीओ आईटी के कार्यकाल में हुए सभी नाम परिवर्तनों की जिम्मेदारी तय हो।
जब तक इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय कमेटी द्वारा जांच नहीं होती, तब तक अमौसी जोन में ईमानदार उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित नहीं हैं।
