मैं उत्तर प्रदेश हूं (Ep-05): सौ साल पुरानी एक अवधी कथा में बची है उत्तर प्रदेश के गांवों की आवाज
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बीसवीं सदी की शुरुआत में जब भारत की भाषाओं और बोलियों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करने की कोशिश हो रही थी, तब भाषा को केवल शब्दों और व्याकरण के सहारे समझना पर्याप्त नहीं माना गया। किसी बोली को जानने के लिए यह भी जरूरी था कि उसमें लोग किस तरह की बातें करते हैं, किस तरह की कहानियां सुनाते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को किन शब्दों में बयान करते हैं। इसी कोशिश में उत्तर भारत की बोलियों के बीच घूमती एक छोटी-सी अवधी कथा भी लिखित रूप में सुरक्षित हो गई।
यह कहानी आज से सौ साल से भी ज्यादा पहले की है। उसमें आंधी के बाद आम के बाग में गई दो पड़ोसिनें हैं, एक निसंतान स्त्री है और उसे झाड़ियों में एक बच्चा मिलता है। वह बच्चे को घर ले आती है और अपना बेटा मानकर पालती है। समय बीतता है। वही बच्चा बड़ा होकर परिवार बसाता है। बुढ़ापे में मां के साथ उसकी पत्नी का व्यवहार बदल जाता है। उसे ठीक से खाना नहीं मिलता। अंत में जब बेटे को सच्चाई पता चलती है तो मां बहू को दंड देने के बजाय उसे माफ करने को कहती है।
साधारण लगने वाली यह कथा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इसमें पारिवारिक रिश्तों का कोई असाधारण संदेश है। इसकी असली अहमियत इस बात में है कि यह उस समय की अवधी को उसके अपने सामाजिक संसार के भीतर दर्ज करती है। सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के Linguistic Survey of India में अवधी के अलग-अलग इलाकों के नमूने प्रकाशित किए गए थे। इसमें “North and West Allahabad” की अवधी के लिए अलग खंड है और इसी खंड में यह लोककथा दर्ज है। यानी एक लोककथा यहां साहित्यिक रचना के रूप में नहीं, भाषा के दस्तावेज के रूप में सामने आती है।
यही फर्क इस कहानी को आज पढ़ने का कारण भी देता है।
भाषा की सीमा नक्शे की सीमा से अलग होती है
उत्तर प्रदेश को आज जिलों और मंडलों के नक्शे पर समझना आसान है। लेकिन बोलियों का भूगोल इतना सीधा नहीं होता। एक भाषा या बोली किसी जिले की सीमा पर रुक नहीं जाती। उसके शब्द, उच्चारण और बोलने का ढंग आसपास के इलाकों से मिलते-जुलते हुए बदलते रहते हैं। अवधी इसका अच्छा उदाहरण है।
अवधी को आम तौर पर अवध क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका भाषाई विस्तार एक बड़े भूभाग में रहा है। लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अयोध्या, गोंडा, बहराइच, सीतापुर, फतेहपुर और आसपास के कई इलाकों में इसके अलग-अलग रूप मिलते रहे हैं। भाषावैज्ञानिक विवरणों में भी अलग-अलग क्षेत्रों की अवधी के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया गया है।
सन 1904 में प्रकाशित ग्रियर्सन के इस सर्वेक्षण की खासियत यही थी कि उसने भाषा को एक ही रंग में रंगने के बजाय उसके क्षेत्रीय रूपों को अलग-अलग नमूनों में दर्ज किया। Linguistic Survey of India में गोंडा, लखनऊ-बाराबंकी, सीतापुर-खीरी, फतेहपुर और इलाहाबाद के अलग-अलग हिस्सों की अवधी के नमूने मिलते हैं। “Central Allahabad”, “North and West Allahabad”, “East Allahabad” और “South-East Allahabad” तक के अलग खंड दिए गए हैं।
यह विभाजन अपने आप में उस समय के उत्तर भारत के भाषाई भूगोल की एक तस्वीर देता है।
आज जब हम अवधी कहते हैं तो अक्सर उसे एक एकरूप भाषा मान लेते हैं। लेकिन गांवों और कस्बों में बोली जाने वाली भाषाएं हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। कुछ दूरी के बाद शब्द बदल सकते हैं, क्रिया का रूप बदल सकता है, उच्चारण बदल सकता है और दूसरी बोली के शब्द उसमें शामिल हो सकते हैं। भाषा की यही जीवंतता उसे किताब की भाषा से अलग बनाती है।
एक कथा में दिखाई देता है पूरा ग्रामीण संसार
ग्रियर्सन के दस्तावेज में दर्ज कथा को ध्यान से पढ़ें तो इसमें केवल घटनाएं नहीं हैं। उसके पीछे एक पूरा ग्रामीण समाज दिखाई देता है। कहानी की शुरुआत आंधी से होती है। आंधी के बाद आम बीनने के लिए दो स्त्रियों का निकलना अपने आप में उस समय के ग्रामीण जीवन का एक छोटा-सा दृश्य है। आम का बाग केवल कथा की जगह नहीं है। वह गांव के जीवन का हिस्सा है – जहां मौसम किसी कहानी को शुरू कर सकता है और प्रकृति किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है।
