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NMC का बड़ा फैसला, अब कोई भी कंपनी खोल सकेगी मेडिकल कॉलेज, नॉन-प्रॉफिट वाली शर्त हटने से बढ़ सकते हैं निजी संस्थान

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लखनऊ। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) ने मेडिकल कॉलेज खोलने के नियमों में एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए अब किसी भी प्रकार की कंपनी को मेडिकल कॉलेज शुरू करने की अनुमति दे दी है। इससे पहले केवल सेक्शन-8 के तहत आने वाली नॉन-प्रॉफिट कंपनियों को ही यह अनुमति थी, लेकिन अब कंपनीज एक्ट 2013 के तहत गठित कोई भी कंपनी इस क्षेत्र में उतर सकेगी।

क्या है सेक्शन-8 कंपनी और अब क्या बदला?

सेक्शन-8 कंपनी पूरी तरह नॉट-फॉर-प्रॉफिट होती है, जिसमें कमाई से बचा हुआ पैसा केवल चैरिटी या संस्थान के विकास में ही खर्च किया जा सकता है, मुनाफे के रूप में नहीं निकाला जा सकता। वर्ष 2017 में तत्कालीन भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (MCI) ने कंपनीज एक्ट 1956 के तहत पंजीकृत सभी कंपनियों को मेडिकल कॉलेज खोलने की छूट दी थी, लेकिन 2019 में NMC के गठन के बाद नियमों को फिर से सख्त कर दिया गया और केवल सेक्शन-8 कंपनियों तक सीमित कर दिया गया। अब NMC ने दोबारा नियमों में ढील देते हुए किसी भी कंपनी को यह अनुमति दे दी है।

सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

सरकार का तर्क है कि नो-प्रॉफिट की अनिवार्य शर्त के कारण बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने से हिचक रही थीं और कई जगहों पर चोरी-छिपे मुनाफा कमाया जा रहा था। अब कानूनी रूप से अनुमति मिलने पर न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि सरकार को टैक्स राजस्व भी प्राप्त होगा।

देश का पहला प्राइवेट लिमिटेड मेडिकल कॉलेज

गौरतलब है कि मई 2017 में वेदांता कंपनी ने महाराष्ट्र के पालघर में ‘वेदांता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ की स्थापना की थी, जो देश का पहला प्राइवेट लिमिटेड मेडिकल कॉलेज बना। कंपनी ने शुरुआत में फीस निर्धारण के लिए सरकारी मंजूरी की जरूरत से इनकार किया था, हालांकि बाद में उसे नियमों का पालन करना पड़ा। वर्ष 2025 में इस कॉलेज की मैनेजमेंट सीट की फीस 15.7 लाख रुपये थी, जो राज्य में सबसे अधिक है। डीम्ड यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेजों की फीस सबसे ज्यादा होती है और हालांकि इन्हें संचालित करने वाले ट्रस्ट और सोसाइटी को नॉन-प्रॉफिट होना चाहिए, लेकिन इनकी फीस पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है और न ही इनमें सस्ती सीटों का कोई कोटा लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और नए नियमों पर बहस

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 और 2002 के अपने फैसलों में स्पष्ट किया था कि शिक्षा एक चैरिटी है और संस्थान मुनाफाखोरी नहीं कर सकते, केवल विस्तार के लिए उचित सरप्लस रख सकते हैं। 2009 तक सरकार का भी यही रुख रहा, लेकिन 2010 में शर्तों के साथ कंपनियों को अनुमति दे दी गई। अब नए नियमों के बाद माना जा रहा है कि देश में निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या में इजाफा होगा, लेकिन फीस को लेकर बहस भी तेज हो सकती है।

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