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सनातन’ की पिच पर अखिलेश यादव की बैटिंग, 2027 के लिए सपा बुन रही नई सियासी बिसात…

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव अपनी पार्टी की ‘मुस्लिम परस्त’ होने की पुरानी छवि को तोड़कर ‘सनातन सम्मान’ की राजनीति की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश यादव ने भाजपा के सबसे मजबूत वैचारिक हथियार ‘हिंदुत्व’ को उसी की पिच पर चुनौती देने की तैयारी कर ली है।

मंदिर, महादेव और रामलला का त्रिकोण
अखिलेश यादव की नई रणनीति में केवल जातीय समीकरण (PDA) ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वीकार्यता भी है। सैफई में बन रहा ‘केदारेश्वर महादेव मंदिर’ सपा के इस नए अवतार का केंद्र है। श्रावण मास में इस मंदिर के भव्य उद्घाटन की तैयारी है, जिसमें देशभर के संतों को बुलाकर सपा एक बड़ा धार्मिक आयोजन करने जा रही है। इसके बाद अखिलेश यादव का अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करना उनके इस मिशन का सबसे बड़ा ‘दांव’ माना जा रहा है।

बीजेपी के एकाधिकार को चुनौती
अब तक विपक्ष भाजपा के सामने हिंदुत्व के मुद्दे पर बैकफुट पर रहता था, लेकिन अखिलेश ने इस परंपरा को बदल दिया है। चाहे वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण हो या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मुद्दा, अखिलेश यादव ने भाजपा को सीधे कटघरे में खड़ा किया है। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि उनकी लड़ाई मंदिर या सनातन से नहीं, बल्कि उस ‘राजनीतिक एकाधिकार’ से है, जिसे भाजपा ने पिछले एक दशक में खड़ा किया है।

बदलता राजनीतिक निष्कर्ष
2024 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर निर्माण के बाद भी अयोध्या में भाजपा की हार ने विपक्ष को नई ऊर्जा दी है। अखिलेश यादव ने इस निष्कर्ष को भांप लिया है कि जनता धार्मिक आस्था के साथ-साथ विकास और स्थानीय मुद्दों को भी उतनी ही गंभीरता से देखती है। अब 2027 के चुनाव में देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश का यह ‘धार्मिक और सामाजिक’ संतुलन उन्हें सत्ता के करीब ले जा पाएगा या भाजपा अपने हिंदुत्व के एजेंडे को दोबारा धार देगी।

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