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भेदभाव से निपटने के लिए बनाए गए नए यूजीसी नियमों पर इतना विवाद क्यों?

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भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन या यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए. ये नियम इसी विषय पर 2012 में लागू किए गए नियमों की जगह जारी किए गए हैं.

जहां 2012 के नियमों में ‘भेदभाव’ की बात की गई थी वहीं 2026 में लाए गए संशोधित नियमों में भेदभाव की परिभाषा में ‘जाति‑आधारित भेदभाव’ को जोड़ा गया है.

नए नियमों के मुताबिक़ “जाति-आधारित भेदभाव” का मतलब सिर्फ़ जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध किया जाने वाला भेदभाव है.

ख़बरों के मुताबिक़ नए नियमों में 2025 के मसौदे में जो झूठी शिकायतों के लिए सज़ा का प्रावधान था, उसे हटा दिया गया है.

यूजीसी के मुताबिक़ नए नियमों का मक़सद ये है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने‑लिखने और काम करने वाले सभी लोग समान अवसरों का लाभ उठा सकें चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता या सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो.

लेकिन नियम लागू होते ही देशभर में इनके ख़िलाफ़ विरोध और बहस शुरू हो गई.

केंद्र सरकार ने भरोसा दिलाया है कि यूजीसी के नए दिशा-निर्देश कैंपस में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं और उनका ग़लत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा.

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