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घर-घर से कबाड़ जुटाकर पिता चलाते हैं परिवार, बहन के कैंसर से लिया डॉक्टर बनने का संकल्प

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कई बार जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा किसी अपने का दर्द बन जाती है. कोटा के पास कैथून कस्बे के गोदल्याहेड़ी गांव के रहने वाले सागर रेगर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और संघर्षों के बीच पले-बढ़े सागर ने न सिर्फ डॉक्टर बनने का सपना देखा बल्कि उसे सच करने के लिए अपनी जान झोक दी. उनकी इस सफलता के पीछे परिवार का संघर्ष, शिक्षा के प्रति अटूट विश्वास और समाज में बदलाव लाने का संकल्प छिपा है.

कई बार कहानियां बड़े-बड़े घरों से नहीं छोटे-छोटे कस्बों से भी निकल जाती है. उन घरों से जहां दो वक्त की रोटी भी मिलना मुश्किल हो जाता है. लेकिन सागर रेगर ने इन मुश्किलों को अपनी मजबूती बना ली है. उन्होंने नीट-यूजी में 564 अंक प्राप्त कर 98.6296 पर्सेंटाइल हासिल की. उन्हें ऑल इंडिया रैंक (AIR) 27157 मिली, जबकि एससी कैटेगरी में ऑल इंडिया रैंक 684 प्राप्त हुई. सागर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कैथून के राजकीय विद्यालय से पूरी की. उन्होंने 10वीं कक्षा में 76 प्रतिशत और 12वीं में 92 प्रतिशत अंक प्राप्त किए.

परिवार के लोग नशे की लत से परेशान 

सागर बताते हैं कि उनका परिवार बड़ा है और अधिकांश सदस्य अशिक्षित हैं. शिक्षा और जागरूकता के अभाव में परिवार के कई लोग नशे की लत का भी शिकार हो गए हैं. उनकी बुआ की बेटी को लंबे समय तक गुटखा खाने की वजह से कैंसर हो गया. इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और तभी उन्होंने डॉक्टर बनने का संकल्प लिया. उनका कहना है कि डॉक्टर बनने के बाद वे केवल मरीजों का इलाज ही नहीं करेंगे, बल्कि परिवार और समाज की नई पीढ़ी को शिक्षा के महत्व और नशामुक्त जीवन के प्रति भी जागरूक करेंगे, ताकि कोई और परिवार ऐसी पीड़ा न झेले.

दो वक्त रोटी भी मुश्किल 

सागर ने बताया कि आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उनके पिता ने साफ कह दिया था कि मेडिकल की तैयारी का खर्च उठाना संभव नहीं है. ऐसे समय में कैथून राजकीय विद्यालय के प्रिंसिपल ने उनका मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा संबल योजना की जानकारी दी. परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया, चयन हुआ और यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई. योजना के तहत उन्हें पूरे साल नीट की निशुल्क पढ़ाई के साथ रहने और खाने की सुविधा भी मिली. एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास की ओर से निशुल्क आवास और भोजन उपलब्ध कराया गया, जिससे वे पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ाई कर सके और अपने साथ-साथ परिवार का सपना भी साकार कर सकें.

सागर की सफलता पर क्या बोले एलन के संस्थापक? 

इस संबंध में एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास के ट्रस्टी एवं एलन के संस्थापक नवीन माहेश्वरी ने कहा कि सरकारी विद्यालयों के हिंदी माध्यम के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आगे लाने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम शुरू किया गया. जब ऐसे बच्चे सफलता हासिल करते हैं तो उसका लाभ केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज प्रेरित होता है और दूसरे बच्चों के लिए भी नई उम्मीद पैदा होती है.

कबाड़ जुटाकर चलता है घर 

सागर के पिता मुरली रेगर घर-घर जाकर कबाड़ जुटाते हैं और उसी से पूरे परिवार का पालन-पोषण करते हैं. उन्होंने बताया कि बेटे का सपना शुरू से डॉक्टर बनने का था लेकिन आर्थिक हालात इतने कमजोर थे कि मेडिकल की तैयारी करवाना संभव नहीं था. इसके बावजूद बेटे की मेहनत और लगन कभी कम नहीं हुई. सही समय पर मिली मदद ने उसकी जिंदगी बदल दी. सागर की मां गृहिणी हैं. पिता जब कबाड़ लेकर घर लौटते हैं तो मां उसमें से स्क्रैप अलग करने में उनकी मदद करती हैं. पूरा परिवार केवल दो कमरों के मकान में रहता है. सागर की दो छोटी बहनें भी हैं. बड़ी बहन मानसी 12वीं कक्षा में बायोलॉजी विषय से पढ़ाई कर रही हैं, जबकि सबसे छोटी बहन इशिका 10वीं कक्षा की छात्रा है.

अगर सहारा नहीं मिलता तो बीएससी में लेना पड़ता प्रवेश

सागर का कहना है कि यदि उन्हें यह अवसर नहीं मिलता तो मेडिकल की तैयारी करना संभव नहीं था और मजबूरी में बीएससी में एडमिशन लेना होता. उनके पिता निरक्षर हैं और मां आठवीं कक्षा तक पढ़ी हैं, लेकिन दोनों शिक्षा का महत्व अच्छी तरह समझते हैं. यही वजह रही कि आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हमेशा बेटे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. आज उसी प्रेरणा, संघर्ष और मेहनत का परिणाम है कि घर-घर से कबाड़ जुटाने वाले पिता का बेटा डॉक्टर बनने की दहलीज पर खड़ा है और अब उसका सपना केवल अपना भविष्य संवारना नहीं, बल्कि समाज को शिक्षा और नशामुक्ति का संदेश देकर नई दिशा देना भी है.

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