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‘यूपी के दो लड़के’ क्या जीत पाएंगे अलग-अलग लड़ के? राहुल-अखिलेश की दोस्ती में आ रही दरार!

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां तेज होते ही विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के दो सबसे बड़े सहयोगियो समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस- के बीच दरारें गहरी होने लगी हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर अलग-अलग दावों, क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जारी तीखी बयानबाजी के बीच आज उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है: क्या अखिलेश यादव और राहुल गांधी आगामी विधानसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़ेंगे?

यह स्थिति तब है जब दोनों दलों ने 2024 के लोकसभा चुनावों में मिलकर जबरदस्त सफलता हासिल की थी। लेकिन आज, जमीनी स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता सहयोगी के बजाय एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहे हैं।

आंकड़ों का खेल: 2024 में क्या हुआ था?

2024 के आम चुनावों में इस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 43 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सत्ताधारी भाजपा नीत एनडीए को 36 सीटों पर समेट दिया था।

पार्टी कुल लड़ीं सीटें जीतीं सीटें मुख्य परिणाम
समाजवादी पार्टी 62 37 सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनी (2019 में सिर्फ 5 सीटें थीं)।
कांग्रेस 17 06 राहुल गांधी (रायबरेली) सहित प्रमुख सीटों पर वापसी।
इंडिया गठबंधन 79 43 43.52% वोट शेयर हासिल किया।

2024 की वो रणनीति जिसने पलट दी थी बाजी

2024 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने खुद को “यूपी के दो लड़के” के रूप में पेश कर एक बेहद सटीक और समन्वित चुनावी अभियान चलाया था। इस रणनीतिक तालमेल के मुख्य स्तंभ ये थे:

सीटों का सटीक गणित: कांग्रेस ने सपा की जमीन को स्वीकार करते हुए महज 17 सीटों पर चुनाव लड़ना स्वीकार किया, जिससे भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रुक गया।

कार्यकर्ताओं का जमीनी जुड़ाव: आगरा में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ जैसे शुरुआती संयुक्त मंचों के जरिए दोनों दलों ने अपने स्थानीय कैडरों के बीच की पुरानी दुश्मनी को भुलाकर एक-दूसरे के लिए वोट ट्रांसफर सुनिश्चित कराया।

मुद्दों और सामाजिक गठजोड़ का विलय: अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को राहुल गांधी के ‘संविधान बचाओ’ और ‘जातिगत जनगणना’ के राष्ट्रीय विमर्श से जबरदस्त ताकत मिली। इसने बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई।

गठबंधन पर अब क्या कह रहे हैं शीर्ष नेता?

तमाम जमीनी खींचतान के बीच, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का आधिकारिक रुख अब भी सकारात्मक है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि सपा-कांग्रेस का गठबंधन आगामी चुनावों में भी जारी रहेगा और उनका मूल मंत्र “सीटें नहीं, जीत” होगा। सपा प्रमुख ने कहा, “हमारा फॉर्मूला सीटों की सौदेबाजी पर नहीं, बल्कि चुनावी सफलता (जिताऊ उम्मीदवार) पर आधारित होगा। हम गठबंधन धर्म निभाना जानते हैं।”

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि दोनों ही शीर्ष नेता जानते हैं कि यदि वे अलग हुए, तो भाजपा-विरोधी वोटों का बिखराव सीधे तौर पर सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाएगा। इसलिए भले ही राज्य स्तर के नेता दबाव बनाने के लिए सार्वजनिक रूप से बयानबाजी कर रहे हों, सीटों का अंतिम फैसला बंद कमरे में राहुल और अखिलेश के बीच ही होगा।

सीट शेयरिंग पर गतिरोध और बयानबाजी की जंग

यूपी कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का कहना है कि पार्टी इस बार “बराबरी और सम्मान” के आधार पर सीटों का समान बंटवारा चाहती है।

अखिलेश यादव ने कांग्रेस को “बड़ा दिल” दिखाने और क्षेत्रीय दलों को उनके प्रभाव वाले राज्यों में प्राथमिकता देने की नसीहत दी है। सपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस का राज्य स्तर पर रिकॉर्ड कमजोर रहा है (2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले लड़कर 403 में से सिर्फ 2 सीटें जीत पाई थी)।

इमरान मसूद के बयान से मचा सियासी घमासान

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के एक बयान ने इस विवाद को हवा दे दी है।

मसूद ने आरोप लगाया, “समाजवादी पार्टी किसी मुखर मुस्लिम नेता को बर्दाश्त नहीं कर सकती। सपा 2024 में 37 सीटें सिर्फ राहुल गांधी के प्रभाव के कारण जीत पाई है और आज वह खुद गठबंधन के लिए चिल्ला रही है।”

इसके जवाब में सपा के वरिष्ठ नेता उदयवीर सिंह ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि इमरान मसूद जैसे नेताओं के बयानों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है और गठबंधन पर कोई भी फैसला केवल शीर्ष नेतृत्व ही करेगा।

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