प्रचंड शत्रु का हवाई हमला

खरीफ की फसल कटते ही देश के सबसे बडे़ उत्सवों का समय आता है। कहीं दिवाली, कहीं छठ, कहीं नरक चौदस। अलग-अलग रूप में हर भाग में शरद ऋतु का सुस्वागत किया जाता है। किंतु उत्तर भारत में यह समय अब अशुभ होता जा रहा है। इसके लक्षण धन-धान्य और कार्तिक के स्नान नहीं हैं, बल्कि दमा, नजला और हृदयाघात जैसे रोग हैं। इस समय राजधानी एक दैत्याकार दमघोंटू हवाई कंबल से दब जाती है। उसका समस्त वैभव, शक्ति, नेतृत्व, कोई भी साधन-संसाधन सांस लेने लायक हवा की आपूर्ति नहीं कर पाता। दिल्ली एक शाप बन जाती है।

दूषित हवा हमारे बच्चों को कमजोर बनाती है, बुजुर्ग को अकाल मृत्यु देती है। जवान लोग या तो बेकार हो जाते हैं या अपने दायित्व का वहन करने लायक स्वास्थ्य बचता नहीं है। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था को हानि होती है, अर्थव्यवस्था विकलांग होती है। यह सब लाखों-करोड़ों की संख्या में होता है, चाहे इसका गणित आप इसकी बलि चढ़ने वाले लोगों को गिन के लगाएं या इस नुकसान को रुपये-पैसे के रूखे हिसाब में बदलें।

इसका एक कारण भूगोल में है। हिमालय की दक्षिणी छाया में बंगाल से पंजाब तक फैला मैदानी इलाका विशेष है। जाड़े के मौसम में यहां के वायुमंडल में ठंडी और गरम हवाओं की तह सी बन जाती है। यह इलाका एक बंद बर्तन-सा बन जाता है। यहां पैदा हुआ धुआं सहज रूप से ऊपर की तरफ उड़ नहीं पाता।

फिर क्या हम हिमालय को कोसें? उसी पर्वत शृंखला की गोदी से आने वाले पानी और उपजाऊ  मिट्टी से तो यह इलाका बना है, बसा है। हमें तो बस इतना ही करना है कि अपने भूगोल की सीमाओं के प्रति विनम्रता बरतें, उन्हीं के आधार पर अपनी व्यवस्थाएं बनाएं। वायु प्रदूषण से बचना सचमुच इतना ही आसान है। यह यंत्र-यंत्रणा-तकनीकी का उलझा हुआ मामला नहीं है। लेकिन विकास के अहंकार में डूबी हमारी राजनीति को अपने परिवेश और उसके स्वभाव का बोध ही नहीं है, उसे विनय के साथ स्वीकार करना तो छोड़ ही दीजिए। हम जान-बूझकर अपना दम घोंटते हैं।

दुनिया के सभी सुचारु शहर निजी वाहनों पर तरह-तरह से रोक लगाते हैं, सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देते हैं। दिल्ली निजी वाहनों की राजधानी है, क्योंकि सरकारों ने सालों-साल सड़क और पुल बनाने पर धन खर्च किया है। यह निजी वाहनों को सार्वजनिक कोष से अनुदान देने के समान है। निजी वाहन चालकों में अपने महंगे वाहन खुद खरीदने का दर्प पाया गया है, पर वे यह नहीं मानते कि जिन चमचमाती सड़कों और उड़न-पुलों पर वे फर्राटा भरते हैं, उसका धन सरकार से आता है। तमाम तरह के राजनीतिक विरोध के बावजूद दिल्ली में वाहनों पर रोक लगी है, जिसके पीछे सर्वोच्च न्यायालय और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का अनवरत प्रयास है। पिछले करीब बीसेक साल में शहर की हवा काफी बेहतर हुई है। सार्वजनिक यातायात को डीजल से हटाकर प्राकृतिक गैस पर डाला गया है। लेकिन ऐसे सभी प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे, अगर उनके आगे का काम नहीं हुआ। हमारे शहर लोगों के लिए बनने चाहिए, मोटर गाड़ियों के लिए नहीं।

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